कुछ लिखे हम मगर , कोई पढ़े और जानले
मेरी आखों से आज, मेरे हाले -दिल जानले
यूँ ना अपनी ही सुना, मेरी भी तो सुन ज़रा
कुछ कहें पर लब्ज़ नहीं, तू ख़ामोशी पेहेचानले
मैं तेरी परछाई सी , और तू मेरा वजूंद
लेकिन तेरा वजूंद मुझसे है, ये भी तू मानले
रुक गया झोका यही , कह गया तेरा नाम
इस शोरे-ऐ -जहां मैं , मेरी आवाज़ पेहेचानले
दिवाना सा फिरे माहि, तू अधुरा दश्त मैं
सोनी करें पूरा गर , मोहब्बत को इबादत मानलें

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