सैलाब से उठे पन्नों पर लिखे तो क्या लिखे
ख़याल आये चले गए , लिखे तो क्या लिखे
ना लिख magar कोई रास्ता नज़र नहीं आता
तूफान गुजर जाये यों ही कोई सहारा नज़र नहीं अता
ना जाने isse कोई, जो जाने वो पढ़े नहीं
जो पढ़े समझता कोई, गुजरे वो कहे नहीं
Naa khud ग़ुम हो soni, तेरी तरह और भी है
मौसकी तेरी कम नहीं, जहाँ मैं ग़ालिब और भी है