Monday, April 18, 2011

To--

सैलाब से उठे पन्नों पर लिखे तो क्या लिखे
ख़याल आये चले गए , लिखे तो क्या लिखे

ना लिख  magar कोई  रास्ता नज़र नहीं आता
तूफान गुजर जाये यों ही कोई सहारा नज़र नहीं अता

ना जाने  isse कोई, जो जाने वो पढ़े नहीं
जो पढ़े समझता कोई, गुजरे वो कहे नहीं

Naa khud  ग़ुम हो soni, तेरी  तरह और भी है
मौसकी तेरी कम नहीं, जहाँ मैं ग़ालिब और भी है

Wednesday, April 13, 2011

तुम थे मगर वो तनहासी राहें हम छोड़ आयें
एक बार मुड़कर देखा मगर तुम्हे हम छोड़ आयें

क्या सुनाई देती है धड़कनें, जरा गौर किजीयें
जो धडकता था वो दिल तुम्हारें पास हम छोड़ आयें

रातें है अकैलिसी किसी ख्वाब मैं तुम चले आवो
मगर simatain से उस पल मैं  नींदें हम छोड़ आयें

कैसे छोड़े जातें हैं वो जो रूह से जुड़ा करते है
माहि तेरे पास सोनी को हम छोड़ आयें